भगत सिंह की फांसी पर चुप क्यों थे अंबेडकर ? इतिहास का कड़वा सच !
मार्च 1931 भारत के इतिहास का वह दर्दनाक दौर था, जो आँसुओं और इंकलाब की स्याही से लिखा गया। पूरा देश लाहौर सेंट्रल जेल में बंद तीन युवाओं—Bhagat Singh, Rajguru और Sukhdev Thapar—की किस्मत का इंतजार कर रहा था। इसी समय बंबई में Dr. B. R. Ambedkar रात-रात भर जागकर अपने विचारों को शब्द दे रहे थे। एक ओर भगत सिंह युवाओं के इंकलाब का प्रतीक थे, तो दूसरी ओर अम्बेडकर करोड़ों शोषितों की आवाज। भगत सिंह केवल एक क्रांतिकारी नहीं, बल्कि गहरे विचारों वाले लेखक भी थे। उन्होंने जातिवाद और छुआछूत के खिलाफ खुलकर लिखा और कहा कि जब तक समाज में बराबरी नहीं होगी, तब तक सच्ची आजादी अधूरी है। अम्बेडकर भी इस सोच से सहमत थे। दोनों का सपना एक ऐसे भारत का था, जो जातिविहीन और समानता पर आधारित हो। जब ब्रिटिश सरकार ने भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी की सजा सुनाई, तब अम्बेडकर चुप नहीं रहे। उन्होंने अपने अखबार “जनता” में एक कड़ा लेख लिखकर इस फैसले को अन्यायपूर्ण बताया और इसे राजनीतिक हत्या कहा। उन्होंने साफ लिखा कि यह फैसला न्याय नहीं, बल्कि ब्रिटिश सत्ता का अहंकार है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर सरकार चाहती, तो सजा को ...